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आख़िर चर्चा में क्यों है बद्रीनाथ मन्दिर का पुजारी मॉडल?

21 Nov 2019
क्यों हो रही है अयोध्या के श्री राम मन्दिर में बद्रीनाथ मन्दिर पुजारी मॉडल अपनाने की मांग?

NOV 21 (WTN) – सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अयोध्या में विवादित ज़मीन पर श्री राम मन्दिर बनने का रास्ता साफ़ हो गया है। अपने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में श्री राम मन्दिर निर्माण और उसके संचालन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का आदेश केन्द्र सरकार को दिया है। श्री राम मन्दिर निर्माण पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद चर्चाएं हैं कि केन्द्र सरकार ट्रस्ट में किसे शामिल करेगी और मन्दिर निर्माण का काम कब से शुरू होगा?

इन तमाम तरह की चर्चाओं के बीच सबसे बड़ी चर्चा यह है कि केन्द्र सरकार श्री राम मन्दिर संचालन के लिए जो ट्रस्ट बनाएगी, उसमें किन्हें शामिल किया जाएगा? लेकिन श्री राम मन्दिर आन्दोलन की शुरू से ही अगुवाई करने वाली विश्व हिन्दू परिषद की मांग है कि ट्रस्ट में न तो सरकार का कोई प्रतिनिधित्व हो, और न ही ट्रस्ट में वैष्णव, शैव और सगुण ब्रह्म को मानने वालों के अलावा किसी अन्य मतावलम्बियों को जगह मिले।
 
मन्दिर निर्माण की स्थिति स्पष्ट होने के बाद अब एक चर्चा और ज़ोरों से हो रही है कि मन्दिर में पूजा करने का अधिकार किसे मिलना चाहिए? इस बारे में विश्व हिन्दू परिषद की मांग है कि पूजा पद्धति को परिवारवाद से बचाने के लिए बद्रीनाथ मन्दिर पुजारी मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। आप सोच रहे होंगे कि मन्दिर में पुजारी की नियुक्ति के लिए बद्रीनाथ मॉडल क्या होता है? तो आइये इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
 
हिन्दुओं के चार तीर्थ स्थलों में से एक बद्रीनाथ में वही ब्राह्मण पुजारी पद पर बना रह सकता है, जब तक कि वो ब्रह्मचारी है। जब तक वो ब्राह्मण पुजारी है उसे नियमों और निष्ठा के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य रहता है। सालों से चली आ रही परम्परा के अनुसार, बद्रीनाथ मन्दिर की पूजा अर्चना के लिए मुख्य पुजारी सिर्फ़ केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण ही बन सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नम्बूदरीपाद ब्राह्मणों को आदि गुरू शंकराचार्य का वंशज माना जाता है।
 
आदि गुरू शंकराचार्य ने ही चारों दिशाओं में भारत में चार धामों की स्थापना की थी, जिसमें बद्रीनाथ मन्दिर एक धाम है। शंकराचार्य खुद केरल के कालडी गांव के निवासी थे, जहां से उन्होंने अपने अनुयायियों और नम्बूदरीपाद ब्राह्मणों के साथ पूरे देश में वैदिक धर्म के उत्थान और प्रचार के लिए काम किया था।
 
इन्हीं नम्बूदरीपाद ब्राह्मणों को रावल भी कहा जाता है। केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मणों में से रावल यानी कि मुख्य पुजारी का चयन बद्रीनाथ मन्दिर समिति ही करती है। बद्रीनाथ मन्दिर के पुजारी जिन्हें कि रावल भी कहा जाता है, उनकी नियुक्ति में त्रावणकोर के राजा की सहमति भी ली जाती है। नम्बूदरीपाद ब्राह्मणों के पुजारी बनाने के लिए न्यूनतम योग्यता है कि इन्हें वेद-वेदांग विद्यालय का स्नातक और कम से कम शास्त्री की उपाधि होने के साथ ब्रह्मचारी भी होना ज़रूरी है।

हिन्दू धर्म के पुनरूत्थान और हिन्दू धर्मावलम्बियों को एकजुट करने के लिये आदि गुरू शंकराचार्य ने ही यह व्यवस्था की थी कि उत्तर भारत के मन्दिर में दक्षिण भारत का पुजारी हो, और दक्षिण भारत के मन्दिर में उत्तर भारत का पुजारी हो। इसलिए रामेश्वरम में उत्तर भारत का कोई पण्डित पुजारी बनता है।

यानी कि बद्रीनाथ के विश्व प्रसिद्ध मन्दिर में मुख्य पुजारी बनने का अधिकार सिर्फ़ केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मणों को ही है और उत्तराखण्ड के स्थानीय डिमरी समुदाय के ब्राह्मण इनके सहायक होते हैं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि डिमरी ब्राह्मण भी मुख्यत दक्षिण भारतीय ही हैं, और यह लोग आदि गुरू शंकराचार्य के साथ ही सहायक अर्चक के तौर पर बद्रीनाथ आए थे। लेकिन एक बार बद्रीनाथ आने के बाद यह वापस केरल नहीं गये और कर्णप्रयाग के पास डिम्मर गांव में रहने लगे, इसलिए इन्हें डिमरी कहा जाता है। बद्रीनाथ मन्दिर में भोग बनाने का अधिकार सिर्फ़ इन्हीं डिमरी पण्डितों को ही होता है।
 
इसी बद्रीनाथ मॉडल के आधार पर ही अयोध्या में श्री राम मन्दिर में पुजारी की नियुक्ति की मांग विश्व हिन्दू परिषद के द्वारा की जा रही है। हिन्दू धर्म के जानकारों के अनुसार, पुजारी की नियुक्ति के लिए बद्रीनाथ मॉडल एक आदर्श मॉडल है, जिसमें पुजारी पद के लिए परिवादवाद नहीं होता है और जो ब्राह्मण योग्य और ब्रह्मचारी होता है उसे ही मन्दिर का पुजारी बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। अब देखना होगा कि केन्द्र सरकार श्री राम मन्दिर निर्माण और संचालन के लिए बनने वाले ट्रस्ट में किसे शामिल करती है, और श्री राम मन्दिर निर्माण के बाद यहां पर पुजारी की नियुक्ति बद्रीनाथ मॉडल पर हो पाती है कि नहीं?