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मोदी सरकार के लिए ‘चिन्ता’ का कारण बना जीएसटी कलेक्शन

12 Dec 2019
कई वस्तुओं और सेवाओं पर बढ़ सकती है जीएसटी दर, राजस्व बढ़ाना सरकार का मक़सद
 
DEC 12 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर अच्छा ख़ासा असर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण प्रभावित हुई हैं। जहां तक भारत की बात है, तो दुनिया की 10 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक आर्थिक सुस्ती का कुछ ज़्यादा ही असर देखने को मिला है।

ऑटो सेक्टर से लेकर टेक्सटाइल सेक्टर तक, भारत का लगभग हर सेक्टर वैश्विक आर्थिक सुस्ती से प्रभावित रहा है। उद्योगों में उत्पादन कम या कुछ समय के लिए बंद होने से लेकर बेरोज़गारी तक, यह वे परिणाम हैं जो कि आर्थिक सुस्ती के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़े हैं और इसी कारण से जीएसटी कलेक्शन में कमी आती जा रही है। जैसा कि आप जानते हैं कि मोदी सरकार ने बड़ी ही आशा और उत्साह के साथ जीएसटी को लागू किया था, लेकिन जीएसटी कलेक्शन के आंकड़े मोदी सरकार के लिए निराशाजनक साबित होते जा रहे हैं।
 
जीएसटी कलेक्शन में आ रही कमी के कारण हो सकता है कि जल्द ही कुछ वस्तुओं या सेवाओं पर जीएसटी दर बढ़ाई जा सकती। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीएसटी की अब तक की राजस्व वसूली संतोषजनक नहीं रही है और इसी कारण से केन्द्र तथा राज्यों की राजस्व वसूली काफ़ी दबाव में आ गई है। कहा जा रहा है कि 18 दिसम्बर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में जीएसटी काउन्सिल की बैठक में कुछ बड़े फ़ैसले लिये जा सकते हैं।

दरअसल, जीएसटी काउन्सिल की बैठक ऐसे समय में हो रही है जबकि जीएसटी कलेक्शन उम्मीद से कम हो रहा है और कई राज्यों को मुआवजा भी नहीं मिल पाया है। लम्बित मुआवजा हासिल करने के लिए राज्य सरकारें केन्द्र सरकार पर दबाव बना रही हैं कि जल्द से जल्द मुआवजे की भरपाई की जाए। इसी के चलते सम्भावना है कि सरकार कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी रेट बढ़ा सकती है, या फ़िर उनका स्लैब बढ़ा सकती है।

कहा जा रहा है कि विलासिता की वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी रेट में बदलाव पर चर्चा की जा सकती है और इन पर जीएसटी दरों में वृद्धि करने का प्रस्ताव भी पारित हो सकता है, जिससे जीएसटी कलेक्शन में वृद्धि हो सके। वहीं राज्यों की मांग है कि जीएसटी में जो सबसे निचला स्लैब 5 प्रतिशत का है, उसे बढ़ाकर 6 से 8 प्रतिशत कर दिया जाए। वहीं राज्यों की मांग है कि जीएसटी की 12 प्रतिशत की दर को बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया जाए।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीएसटी में इस समय चार दरें हैं। पहली दर 5 प्रतिशत की, दूसरी दर 12 प्रतिशत की है वहीं तीसरी दर 18 प्रतिशत की तो चौथी दर 28 प्रतिशत की है। वहीं 28 प्रतिशत स्लैब की श्रेणी में आने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर उपकर भी लिया जाता है। जानकारी के लिए बता दें कि यह उपकर 1 से 25 प्रतिशत के बीच हो सकता है।

वहीं मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, जीएसटी काउन्सिल की बैठक में जीएसटी दरों का आपस में विलय भी किया जा सकता है और वर्तमान में मौजूद 4 स्लैब को घटाकर 3 भी किया जा सकता है। इतना ही नहीं, जीएसटी के तहत दी जा रही छूटों पर काउन्सिल फ़िर से विचार भी कर सकती है। वहीं काउन्सिल इस बात पर भी फ़ैसला ले सकती है कि क्या कुछ सेवाओं पर उपकर लगाया जा सकता है कि नहीं?

अर्थशास्त्रियों के अनुसार इस बार की जीएसटी काउन्सिल की बैठक केन्द्र और राज्य सरकारों के अलावा आम जनता के लिए भी काफ़ी अहम साबित हो सकती है। जैसा कि आप जानते हैं कि पिछले कुछ महीनों से जीएसटी और उपकर की वसूली काफ़ी कम रही है। ऐसे में लगातार कम होते जीएसटी कलेक्शन के कारण कई वस्तुओं और सेवाओं को पहले से ऊंचे जीएसटी स्लैब में रखा जा सकता है। वहीं कुछ सेवाओं पर उपकर भी लगाया जा सकता है तो ऐसे में स्वाभाविक है कि यदि ऐसा होता है तो इसका बोझ सीधे-सीधे आम जनता पर ही पड़ेगा।