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अर्थव्यवस्था के आंकड़ों ने दिखाया मोदी सरकार को ‘आईना’!

13 Dec 2019
मोदी सरकार के लिए चुनौती बनी 'कमज़ोर' होती अर्थव्यवस्था

DEC 13 (WTN) – इस साल हुए लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए ने शानदार तरीक़े से जीत हासिल की और एक बार फ़िर से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में एनडीए कामयाब रही। जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 की समाप्ति से लेकर नागरिकता संशोधन क़ानून समेत कई ऐसे फ़ैसले हैं, जिनके कारण यह साल मोदी सरकार के लिए ऐतिहासिक रहा है। लेकिन अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर मोदी सरकार को इस साल काफ़ी झटके लगे हैं और जनता की नाराज़गी उठाना पड़ी है।
 
घटती जीडीपी ग्रोथ रेट, बढ़ती महंगाई, घटता उद्योगिक उत्पादन और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार को जनता की नाराज़गी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि अर्थव्यवस्था में मंदी के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ मोदी सरकार ही ज़िम्मेदार है। दरअसल, वैश्विक आर्थिक सुस्ती और अमेरिका-चीन के बीच जारी ट्रेड वार ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर काफ़ी नकारात्मक प्रभाव डाला है। आंकड़े बता रहे हैं कि इस वित्त वर्ष में अभी तक भारतीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी झटके लगे हैं, और इसी कारण से जीडीपी ग्रोथ रेट में गिरावट होती जा रही है।

29 नवम्बर को जारी हुए चालू वित्त वर्ष (2019-20) की दूसरी तिमाही के जीडीपी आंकड़ों ने एक बार फ़िर से मोदी सरकार की अर्थनीति को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। दूसरी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि देश की आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में और भी ज़्यादा ख़राब हो गई है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट सिर्फ़ 4.5 प्रतिशत ही रही है, जो कि क़रीब 6 साल में किसी एक तिमाही की सबसे बड़ी गिरावट है।
 
वहीं अक्टूबर महीने के कोर सेक्टर के आंकड़ों ने भी मोदी सरकार को निराश किया है। आंकड़ों के मुताबिक़, एक साल पहले के मुक़ाबले इस साल अक्‍टूबर महीने में कोर सेक्‍टर में 5.8 प्रतिशत की कमी आई है। कोर सेक्टर्स में सिर्फ़ फर्टिलाइज़र्स सेक्‍टर को छोड़ दिया जाए, तो बाक़ी बचे 7 अन्य सेक्टर्स का प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 8 प्रमुख कोर सेक्‍टर्स की भारत के कुल औद्योगिक उत्पादन में क़रीब 40 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसे में कोर सेक्टर्स के निराशाजनक प्रदर्शन से अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगना स्वाभाविक है।

वहीं कोर सेक्टर्स के आंकड़ों के साथ-साथ औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) के अक्टूबर महीने के आंकड़े भी मोदी सरकार के लिए चिन्ता का कारण बन गये हैं। जानकारी के लिए बता दें कि अक्टूबर महीने में औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) में 3.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, औद्योगिक उत्पादन में सितम्बर महीने में 4.3 प्रतिशत और अगस्त महीने में 1.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गई है, जो कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए चिन्ता का कारण है।

आर्थिक मंदी से जो इण्डस्ट्री सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है वो है ऑटो इण्डस्ट्री। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऑटो इण्डस्‍ट्री की मंदी का दौर नवम्बर महीने में भी जारी रहा। SIAM (Society of Indian Automobile Manufacturers) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक़, नवम्बर महीने में ऑटो सेक्टर की कुल बिक्री में वार्षिक आधार पर 12.05 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गई। वहीं अप्रैल से नवम्बर महीने के दौरान ऑटो सेल्स में क़रीब 16 प्रतिशत की कमी दर्ज़ की गई है।
 
वहीं आरबीआई यानी कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने ताज़ा अनुमान में मोदी सरकार को एक बड़ा झटका दिया है। अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई ने वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान देश की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को 6.1 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है। आरबीआई ने अपनी समीक्षा में कहा है कि विभिन्न कारणों से आर्थ‍िक गतिविधियां और भी कमज़ोर पड़ी हैं जिससे उत्पादन की खाई नकारात्मक बनी हुई है।
 
वहीं महंगाई के मुद्दे पर भी मोदी सरकार को एक बड़ा झटका लगा है। प्याज समेत अन्य सब्जियों, दाल और मांस-मछली जैसी प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से नवम्बर महीने में खुदरा मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो कि तीन साल का सबसे उच्चतम स्तर है। इससे पहले जुलाई 2016 में खुदरा महंगाई दर 6.07 प्रतिशत थी। यह वो आंकड़ा है जो कि मोदी सरकार के लिए चिन्ता का सबसे कारण है, क्योंकि इससे देश की आम जनता सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।
 
वहीं वैश्विक आर्थिक सुस्ती और देश की अर्थव्यवस्था के निराशाजनक प्रदर्शन के कारण लोगों का अर्थव्यवस्था पर भरोसा भी कम हुआ है। आरबीआई की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, नवम्बर महीने में कन्ज्यूमर कॉन्फिडेंस इण्डेक्स गिरकर 85.7 अंक पर पहुंच गया है, जो कि साल 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे निचला स्तर है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कन्ज्यूमर कॉन्फिडेंस इण्डेक्स में गिरावट का अर्थ होता है कि लोगों का देश की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कम हुआ है और लोग कम ख़रीददारी कर रहे हैं और ख़रीददारी कम होने से स्वाभााविक है कि बाज़ार और उद्योग-धंधे प्रभावित होते हैं।
 
ज़ाहिर है कि यह आंकड़े मोदी सरकार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। हालांकि, वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारत जैसी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को काफ़ी प्रभावित किया है। लेकिन मोदी सरकार सिर्फ़ वैश्विक आर्थिक मंदी को ही अर्थव्यवस्था में गिरावट के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकती है। वैश्विक आर्थिक मंदी और अमेरिका-चीन ट्रेड वार उन कई कारणों में से कुछ कारण हो सकते हैं, जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं लेकिन सिर्फ़ इन्हीं कारणों को अर्थव्यवस्था की गिरावट के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार ठहराया कहीं ना कहीं अपनी ज़िम्मेदारी से भागना ही है।