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कोरोना वायरस की महामारी से डरी दुनिया को याद आई प्राचीन भारतीय परम्पराएं

18 Mar 2020
कोरोना वायरस से 'लोहा' से सकते हैं तांबे के बर्तन!

MARCH 18 (WTN) – चीन के वुहान शहर से फैला कोरोना वायरस संक्रमण इस लेख को लिखे जाने तक 7,988 लोगों की जान ले चुका है। भारत समेत 100 से ज़्यादा देशों में कोरोना वायरस संक्रमण फैल चुका है। ऐसे में कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा लोगों को लगातार सलाह दी जा रही है कि वे 'निर्जीव वस्तुओं' को कम से कम छुएं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा लोगों को एडवायज़री जारी की गई है कि पूरी कोशिश करें कि हाथों को निर्जीव वस्तुओं के सम्पर्क में लाने से बचाएं क्योंकि उनमें कोरोना वायरस हो सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि कोरोना वायरस निर्जीव वस्तुओं पर 9 दिनों तक ज़िन्दा रह सकता है। ऐसे में सभी को यह सलाह दी जा रही है कि निर्जीव वस्तुओं को छूने से परहेज करें।
 
लेकिन स्वाभाविक है कि दैनिक उपयोग की वस्तुओं को तो रोज़ छूना ही पड़ता है। लेकिन इन दिनों एक दावा किया जा रहा है कि तांबे की धातु से बनी वस्तुओं को आप छू सकते हैं क्योंकि तांबे की धातु से बने बर्तनों और सामानों में कोरोना वायरस जल्दी मर जाता है! जी हां, यह बात सही है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तांबा एकमात्र ऐसी धातु है, जो किसी भी बैक्टीरिया को सम्पर्क में आते ही मिनटों में मार देती है। इसी कारण से अब दुनियाभर के वैज्ञानिक प्रयास कर रहे हैं कि ज़्यादातार वस्तुओं की सतह ऐसी धातु (तांबे) से बनाई जाए जिन पर बैक्टीरिया का असर ना हो या हो तो कम हो।

जैसा कि आप जानते ही हैं कि भारतीय प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में पहले से ही तांबे के गुणों के बारे में बताया गया है। आयुर्वेद में इस बात को प्रमाणित किया गया है कि तांबे में एण्टी-बैक्टीरियल और एण्टी-माइक्रोबिल गुण होते हैं, और तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करने से मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि सदियों से भारतीय लोग तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन आधुनिकता के दौर में फैशन के चलते तांबे के बर्तनों की जगह स्टील ने ले ली। और यही कारण है कि तांबे के एण्टी-बैक्टीरियल और एण्टी-माइक्रोबिल गुणों से मनुष्य दूर होता चला गया।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2015 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथहैम्पटन ने एक शोध में दावा किया था कि तांबा फेफड़ों को संक्रमित करने वाले वायरस से बचा सकता है। यानी कि तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करने से SARS (Severe Acute Respiratory Syndrome) और MERS (Middle East respiratory syndrome) जैसी बीमारियों के वायरस से बचा जा सकता है। वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथहैम्पटन के शोधकर्ताओं के मुताबिक़, जीव-जंतुओं से मनुष्यों में आने वाले कोरोना वायरस 229E को भी तांबा मार सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि कोरोना वायरस बाक़ी वस्तुओं की सतह पर कई दिनों तक जीवित रह सकता है। लेकिन अभी यह जानकारी सामने नहीं आई है कि कोरोना वायरस COVID-19 तांबे की सतह पर आकर मारेगा या नहीं। हालांकि, इस पर बात पर वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं।
 
इधर, अमेरिकन सोसाइटी ऑफ़ माइक्रोबायलॉजी में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक़, यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैण्ड की शोधकर्ता रीटा आर. कॉरवेल ने कोरोना वायरस (COVID-19 नहीं) का विभिन्न सतहों पर अध्ययन किया है। कॉरवेल ने अनुसार तांबे की सतह के सम्पर्क में आते ही पुराने कोरोना वायरस का जीनोम नष्ट हो जाता है। इसके अलावा वायरस के बाहरी हिस्से में निकले कांटे जैसे ढांचे टूटने लगते हैं और उसकी बाहरी लेयर नष्ट हो जाती है। अपने अध्ययन के आधार पर उनका कहना है कि पुराना कोरोना वायरस तांबे की सतह पर आते ही मर जाता है या फिर निष्क्रिय हो जाता है। लेकिन अब यह देखना होगा कि COVID-19 कोरोना वायरस को तांबा मार सकता है या नहीं? तांबे के गुणों से लोग धीरे-धीरे परिचित होते जा रहे हैं, और इसी कारण से कुछ लोग आजकल तांबे का बाथटब तक नहाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
 
इन रिसर्च से एक बात तो फिर से साबित होती है कि भारतीय प्राचीन आयुर्वेद पद्धति वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित थी। भारतीय संस्कृति में तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल प्राचीन समय से ही होता आ रहा है। भारतीय लोग प्राचीन समय से ही इस बात को जानते थे कि तांबे में एण्टी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। इसलिए ही पुराने जमाने में लोग तांबे के बर्तनों में रखा पानी पीते थे। लेकिन आधुनिकता के चलते धीरे-धीरे तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल कम होने लगा है। लेकिन अब जबकि तांबे के एण्टी-बैक्टीरियल गुणों का वैज्ञानिकों ने भी लोहा मान लिया है, तो ऐसे में एक फ़िर से तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करना ही बुद्धिमत्ता होगी।