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...तो 'इस तरह' से नेपाल को आधिपत्य में लेता जा रहा है चीन!

04 Jul 2020

चीन ने विस्तारवाद के लिए अपनाया नया 'पैतरा'

JULY 04 ( WTN) - चीन अपनी विस्तारवादी कूटनीति के लिए पूरी दुनिया में 'बदनाम' है। भारत ही नहीं, बल्कि चीन के अपने हर पड़ोसी देश के साथ सीमा विवाद है, और चीन सीमावर्ती देशों की ज़मीन पर अपना 'हक़' जताता रहता है। चीन की हिम्मत यहां तक बढ़ गई है कि अब चीन ने रूस के एक शहर व्लाडिवोस्तक पर अपना अधिकार जता दिया है।

ख़ैर, चीन जानता है कि अब समय बदल गया है, इसलिए हथियारों के दम पर किसी दूसरे देश पर आधिपत्य जमाना काफी कठिन है। ऐसे में अब चीन की वामपंथी सरकार अन्य देशों में आर्थिक और सांस्कृतिक घुसपैठ कर रही है जिससे इन देशों की आंतरिक और विदेश नीति को 'प्रभावित' किया जा सके।

इसी कड़ी में चीन ने दुनिया के काफी देशों को क़र्ज़ देकर उन्हें अपने 'पक्ष' में कर लिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन द्वारा अन्य देशों को दिया गया क़र्ज़ विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा दिए गए क़र्ज़ से भी ज़्यादा है। इतना ही नहीं, चीन अब कई देशों में सांस्कृतिक घुसपैठ तक कर रहा है, और चीन की इस 'कुटिल कूटनीति' का शिकार बन रहा है भारत और चीन के बीच स्थित देश नेपाल।

जैसा कि आप जानते ही हैं कि पिछले कुछ समय से नेपाल की सरकार भारत विरोधी फैसले ले रही है। फिर वो चाहे उत्तराखण्ड के तीन इलाकों पर अपनी दावेदारी जताना हो, या फिर भारतीय बहुओं को नेपाल की नागरिकता शादी के 7 साल बाद मिलने का नागरिकता संशोधन क़ानून हो। साफ है कि इस सबके पीछे नेपाल में चीन की बढ़ती 'दखलंदाज़ी' है। इन दिनों चीनी राजदूत की नेपाल की राजनीति में सीधे 'दखल' देखी जा सकती है 

अब सांस्कृतिक विस्तारवाद की नीति के तहत चीन अब नेपाल में चीनी भाषा को नियोजित तरीके से फैला रहा है जिससे आने वाले समय में नेपाल की युवा पीढ़ी में चीन भाषा के ज़रिए चीन की सभ्यता और संस्कृति को फैलाया जा सके, और इस तरह से चीन का नेपाल में 'वर्चस्व' बढ़े।

दरअसल, चीन यह सब 'पाइव फिंगर पॉलिसी' के तहत कर रहा है क्योंकि चीन का मानना है कि तिब्बत उसकी एक हथेली है और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश हथेली की पांच उंगलियां। इसी कारण से नेपाल पर चीन अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि  नेपाल के नियमों के अनुसार कोई भी विदेशी भाषा किसी भी बच्चे के लिए अनिवार्य नहीं की जा सकती है। लेकिन नेपाल के कुछ बड़े स्कूलों में चीनी भाषा को अनिवार्य कर दिया गया है। बता दें कि इन स्कूलों में चीनी भाषा सिखाने के लिए बाकायदा चीनी दूतावास से सैलरी मिलती है और काठमांडू का चीनी दूतावास ही इसके लिए टीचर भी उपलब्ध कराता है। इन बड़े स्कूलों के बाद अब कई दूसरे निजी स्कूलों में भी चीनी भाषा बच्चों के लिए अनिवार्य कर दी गई है।

भारत को घेरने की कूटनीति के तहत चीन के लिए नेपाल में वर्चस्व हासिल करना काफी ज़रूरी है। इसलिए ही चीन नेपाल को क़र्ज़ और वित्तीय सहायता आदि देकर उसे अपने वर्चस्व में लाने की कोशिश में सफल हुआ जा रहा है। वहीं अब नेपाल में चीन आर्थिक और सांस्कृतिक वर्चस्व भी स्थापित कर रहा है।

नेपाल के ज़रिए चीन अपने व्यापारिक हितों को पूरा करना चाहता है। इसी कारण से नेपाल में चीन ने सड़कों पर काफी निवेश करने की योजना बनाई है। वहीं, नेपाल और चीन के बीच रेलवे लिंक बनाने की भी योजना है। इतना ही नहीं, अब चीन नेपाल के पोखरा शहर में हवाई अड्डा बनाने की तैयारी में है। दरअसल, नेपाल के रास्ते चीन भारत से व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ नेपाल पर आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से 'आधिपत्य' जमाने की कूटनीति पर काम कर रहा है।

कूटनीति के तहत ही अब चीन के पर्यटक नेपाल में बड़ी तादाद में आ रहे हैं। वहीं, चीनी पर्यटकों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अब नेपाल के बाज़ारों में बहुतायत में चीनी सामान भी मिलने लगे हैं। इतना ही नहीं, काठमांडू के बाज़ारों में तो नेपाली दुकानदार चीनी पर्यटकों से चीनी भाषा में बात करने लगे हैं। और तो और यहां के बाज़ारों में दुकानों पर चीनी भाषा के साइन बोर्ड भी लगे हुए हैं। साफ है कि चीन अपनी विस्तारवादी नीति के तहत नेपाल समेत अन्य देशों में आर्थिक और सांस्कृतिक तरीके से घुसपैठ कर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है।