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...तो क्या कोरोना वायरस संक्रमण से ठीक होने पर फिर से है संक्रमित होने का ख़तरा?

23 Jul 2020

कोरोना वायरस की एंटीबॉडी की 'क्षमता' पर उठे सवाल!

JULY 23 (WTN) - भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में कोरोना वायरस संक्रमण बीमारी (COVID-19) के मामले दिनों-दिन तेज़ी से बढ़ते ही जा रहे हैं। चीन के वुहान शहर से फैली कोरोना वायरस संक्रमण बीमारी इस समय मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। इस लेख को लिखे जाने तक, कोरोना वायरस संक्रमण से अभी तक पूरी दुनिया में 6,30,343 लोगों की मौत हो चुकी है।

ख़ैर, जैसा कि आप जानते ही हैं कि अभी तक कोरोना वायरस संक्रमण की कोई भी दवा या वैक्सीन नहीं बन सकी है। हालांकि, दुनियाभर के वैज्ञानिक कोरोना वायरस संक्रमण बीमारी की दवा और वैक्सीन बनाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से इस दिशा में अभी तक कोई भी ठोस सफलता हासिल नहीं हो सकी है।

वैसे इन तमाम तरह की परेशानियों के बीच भी डॉक्टर्स अपने स्तर पर कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं और कई मरीज़ ठीक भी हो रहे हैं। यानि भारत समेत कई देशों में मरीज़ रिकवर हुए हैं और एक्टिव केस की संख्या भी कम हुई है। लेकिन एक शोध में दावा किया गया है कि COVID-19 से रिकवर हो चुके मरीज़ों के भविष्य में भी कोरोना वायरस से संक्रमित होने की आशंका है।

दरअसल, न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिसर्च में दावा किया गया है कि कोरोना वायरस से संक्रमित जिन मरीज़ों में सिर्फ हल्के लक्षण थे और जो रिकवर हुए थे, तो ऐसे मरीज़ों के भविष्य में दोबारा से कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित होने की आशंका है। साफ है कि रिसर्च के दावे से सवाल उठ खड़ा हुआ है कि हर्ड इम्युनिटी और वैक्सीन लम्बे समय तक उपयोगी रहेगी कि नहीं?

इस रिसर्च के अनुसार, कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित हल्के लक्षणों वाले 34 मरीज़ों का इस रिसर्च के लिए रक्त परीक्षण किया गया। इन 34 मरीज़ों में से किसी को भी ICU की ज़रूरत नहीं थी, और न ही इन्हें वेंटिलेटर और रेमडेसिविर दवा की ज़रूरत पड़ी थी।

बता दें कि इन 34 मरीज़ों के नमूनों में एंटीबॉडीज़ की स्टडी की गई थी। इन मरीजों में कोरोना वायरस के लक्षण दिखने के क़रीब 37 दिन बाद पहले नमूने लिये गए, और दूसरे नमूने कोरोना वायरस से संक्रमित होने के 86 दिन बाद लिए गए। जब शोधकर्ताओं ने इन 34 मरीज़ों के रक्त नमूनों का परीक्षण किया, तो इन्होंने पाया कि इन मरीज़ों में एंटीबॉडी स्तर तेज़ी से कम हुआ था। वहीं, एंटीबॉडीज़ का यह नुकसान कोरोना वायरस के पिछले वर्जन SARS की तुलना में काफी ज़्यादा तेज़ी से हुआ।

दरअसल, दुनिया भर के वैज्ञानिक इसी दिशा में अध्ययन कर रहे हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित होने के बाद मरीज़ के शरीर में उत्पन्न हुई इम्युनिटी कितने लंबे समय के लिए है? हालांकि,  अभी तक ऐसे कम मामले ही सामने आए हैं जिनमें कोरोना वायरस संक्रमण से ठीक होने के बाद मरीज़ फिर से कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित हुआ हो।

इधर, लंदन के किंग्स कॉलेज के नए अध्ययन में दावा किया गया है कि कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित होने के मात्र तीन महीनों के बाद ही एंटीबॉडी का स्तर इतना गिर जाता है कि उन्हें ट्रैस कर पाना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, स्वीडन के हेल्थ सिस्टम के शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि जो लोग भी कोरोना वायरस संक्रमण की चपेट में आए थे, वो कम से कम अगले छह महीनों के लिए इम्यून हो गए हैं, अब भले ही उनके शरीर में एंटीबॉडी विकसित हुई हो या नहीं।

वैसे न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित रिसर्च से कई वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं, और उनका कहना है कि इस दिशा में और भी ज़्यादा अध्ययन करने की ज़रूरत है। दरअसल, कई वैज्ञानिकों का मानना है कि इस स्टडी से यह साबित नहीं हुआ है कि कोरोना वायरस संक्रमण के ख़िलाफ़ शरीर में पैदा हुई एंटीबॉडी, संक्रमण के ख़िलाफ़ सुरक्षा देने में सक्षम नहीं है।