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जानिए क्यों 5 से 6 रुपये प्रति लीटर सस्ता होने वाला है पेट्रोल और डीज़ल?

09 Mar 2020
सऊदी अरब और रूस के बीच प्राइस वार के बाद भी अनुमान के मुताबिक़ भारत में उतना सस्ता नहीं होगा पेट्रोल-डीज़ल

MARCH 09 (WTN) – भारत जैसे तेज़ी से विकास करते देश के लिए कच्चे तेल की कम क़ीमतें काफ़ी मायने रखती हैं। दरअसल, भारत अपनी तेल ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। जैसा कि आप जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में ज़्यादातर सौदे अमेरिकी डॉलर में किये जाते हैं, तो ऐसे में कच्चे तेल के आयात के लिए भारत को बड़ी तादात में अमेरिकी डॉलर ख़र्च करने पड़ते हैं। कच्चे तेल की क़ीमतों का नियंत्रण में रहना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काफ़ी ज़रूरी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कच्चे तेल की क़ीमतों में वृद्धि होने पर भारत की तेल कम्पनियों को भी कच्चा तेल महंगी दरों पर आयात करना पड़ेगा। अब जबकि तेल कम्पनियां कच्चा तेल महंगी दरों पर आयात करेंगी, तो स्वाभाविक है कि तेल कम्पनियां घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि करेंगी।

वहीं जब डीज़ल के दाम बढ़ेंगे, तो इससे ट्रांसपोर्टेशन का ख़र्चा भी बढ़ेगा। और ट्रांसपोर्टेशन का ख़र्चा बढ़ने से रोज़मर्रा के सामान की ढुलाई महंगी होने से महंगाई बढ़ेगी। यानी साफ़ है कि भारत में महंगाई का काफ़ी कुछ सम्बन्ध अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों पर निर्भर है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कच्चे तेल की क़ीमतों का निर्धारण बड़ा संवेदनशील मामला है। तेल निर्यात करने वाले खाड़ी देशों में घटित होने वाली कोई घटना या खाड़ी देशों के अन्य देशों के साथ कूटनीतिक सम्बन्धों में किसी भी तरह के उतार-चढ़ाव से तेल की क़ीमतों पर असर पड़ता है। जैसा कि आप जानते ही हैं कि हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आशंका चरम पर थी, ऐसे में कच्चे तेल की क़ीमतों में काफ़ी उछाल आ गया था, और इसी कारण से भारत में पेट्रोल-डीज़ल महंगा हो गया था।

लेकिन जहां तक कच्चे तेल की क़ीमतों की बात है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फ़िलहाल अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों में क़रीब 30 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज़ की गई है। अब आप सोच रहे होंगे कि कच्चे तेल की क़ीमतों में अचानक इतनी बढ़ी गिरावट क्यों हो गई है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कच्चे तेल की क़ीमतों में यह बड़ी गिरावट सऊदी अरब और रूस के बीच जारी प्राइस वार के कारण आई है। जानकारी के लिए बता दें कि साल 1991 के बाद कच्चे तेल की क़ीमतों में यह सबसे बड़ी गिरावट है। वैसे सऊदी अरब और रूस के बीच जारी प्राइस वार के अलावा, कोरोना वायरस संक्रमण के कारण भी तेल की वैश्विक मांग में कमी के कारण भी क़ीमतों में इतनी ज़्यादा गिरावट आई है।

सबसे पहले तो आपको बताते हैं कि सऊदी अरब और रूस के बीच प्राइस वार क्यों शुरू हुआ है ? दरअसल, सऊदी अरब, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े तेल उत्पादक देश रूस को इसलिए सबक सिखाना चाहता है क्योंकि रूस ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों (OPEC) के संगठन द्वारा प्रस्तावित तेल उत्पादन में कटौती डील का प्रस्ताव मानने से इनकार कर दिया है। जानकारी के लिए बता दें कि OPEC और अन्य तेल उत्पादकों देशों ने कोरोनो वायरस प्रकोप के कारण आई आर्थिक गिरावट के कारण कच्चे तेल की गिरती क़ीमतों को स्थिर करने के लिए तेल उत्पादन में कटौती का समर्थन किया था। लेकिन रूस ने तेल उत्पादन घटाने से इनकार कर दिया। दरअसल, तेल की मांग कम होने के बाद भी तेल की आपूर्ति पहले जैसी ही बनी हुई है। ऐसे में तेल निर्यातक देशों के संगठन OPEC और अन्य सहयोगियों के बीच तेल उत्पादन में कटौती को लेकर बैठक हुई थी, लेकिन सऊदी अरब का आरोप है कि रूस के अड़ियल रवैये के कारण बैठक में तेल उत्पादन में कटौती को लेकर कोई भी समझौता नहीं हो पाया। रूस के इस रूख से सऊदी अरब ने नाराज़गी जताते हुए तुरन्त ही कच्चे तेल की क़ीमतों में भारी कटौती करने की घोषणा कर दी।

रूस को सबक सिखाने के लिए सऊदी अरब ने कच्चे तेल की क़ीमतों में कटौती कर दी है, सऊदी अरब ने अप्रैल के लिए अपनी आधिकारिक बिक्री के कोटे में कटौती करके सभी कच्चे ग्रेडों की क़ीमत 6 से 8 डॉलर प्रति बैरल घटा दी है। स्वाभाविक है कि सऊदी अरब के इस बड़े क़दम से अंतर्राष्ट्रीय तेल बाज़ार में प्राइस वार छिड़ने की आशंका पैदा हो गई है। सऊदी अरब द्वारा कच्चे तेल की क़ीमतों में कटौती के बड़े फ़ैसले के बाद अंतर्राष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड फ्यूचर 31.5 प्रतिशत सस्ता होकर 31.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। जानकारी के लिए बता दें कि 17 जनवरी, 1991 को पहला खाड़ी युद्ध शुरू होने और 12 फरवरी, 2016 के बाद यह कच्चे तेल की क़ीमतों में सबसे बड़ी गिरावट है। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड की कीमतें भी 27.4 प्रतिशत कम होकर 30 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं। बता दें कि पहले खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड की क़ीमतों में यह सबसे बड़ी गिरावट है।

अब जबकि कच्चे तेल की क़ीमतों में क़रीब 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गई है, तो ऐसे में भारत में पेट्रोल और डीज़ल क़रीब 5 से 6 रुपये प्रति लीटर सस्ते हो सकते हैं। हालांकि, कुछ लोगों का सोचना है कि चूंकि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों में क़रीब 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गई है, तो ऐसे में भारत में पेट्रोल और डीज़ल के दाम और भी कम हो सकते हैं। लेकिन जानकारों के मुताबिक़, भारत में पेट्रोल-डीज़ल के दाम में ज़्यादा गिरावट नहीं आएगी क्योंकि फ़िलहाल अमेरिकी डॉलर के तुलना में भारतीय करेंसी रुपये में कमज़ोरी बनी हुई है। लेकिन पेट्रोल-डीज़ल के दाम में 5 से 6 रुपये प्रति लीटर की कमी भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ समय के लिए राहत की बात होगी, और पेट्रोल-डीज़ल के दाम में इतनी गिरावट आने से एक आम भारतीय नागरिक को महंगाई से कुछ समय के लिए राहत मिल जाएगी।